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Thursday, April 10, 2008

सब अपने हैं यहां


कितना अच्छा होता है

जब कोई नहीं होता

और सब अपने होते हैं

आसमां बाहें फैलाते हुए

आगोश में लेता है

और धरती अपने सीने को और चौड़ा कर देती है

जैसे कह रही हो

मातम से निकलो

सब अपने ही हैं यहां

और मैं धीरे धीरे निकलने लगती हूं

मुझे अहसास होने लगते हैं

अपने आस पास कुछ लोग

बेढब मन लिये

उनके हाथ मेरी तरफ बढ़ने लगते हैं

मैं कांपती हूं

और एक बार

फिर अकेला होने को बेताब हो उठती हूं

2 comments:

संजय तिवारी said...

कविता में आपका अकेलापन दिखता है लेकिन कविता के आगे जहां और भी हैं...

PD said...

कविता अच्छी है.. और संजय जी कि बात भी सही है..
आपकी पिछली कहानी के पूरे होने के इंतजार में हूं..