Friday, May 16, 2008

ग़र फैसला हो तो...

मेरे हल्क से भी उतरे
ग़र फैसला हो तो ऐसा हो

तामिल करे मौन दीवारें...
नज़र सज़दे में झुक जाए

मेरे ह्ल्क से भी उतरे
ग़र फैसला हो तो ऐसा हो

इसे आरज़ू कहें
या अर्ज़ी

दरकते ज़िगर का ख्वाब
बस इतना है...

Thursday, May 15, 2008

"राज ठाकरे जी" ये वक्त राष्ट्र को जोड़ने का है उसे तोड़ने का नहीं....

राज ठाकरे को मी मराठी का कीड़ा इस तरह काट गया है कि वो बाकी सब भूल गए हैं...वो ये तक भूल गए हैं कि हजारों लाखों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक नेता की मर्यादा क्या होनी चाहिए....जिस तरह से राज ठाकरे बिहार यूपी को टारगेट कर रहे हैं या तो इस बात से बिहार और यूपी सरकार को सीखना चाहिए....या फिर केंद् को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए...केंद्र को ये तय करना चाहिए कि एक प्रदेश का आदमी दूसरे प्रदेश में नहीं फटकेगा....ये तय करने का अधिकार राज ठाकरे या किसी भी दूसरे नेता को कतई नहीं होना चाहिए.....जाने किस सेंस में राज ठाकरे ने ये कह दिया कि यूपी बिहार के लोग कौवा हैं.....और लालू चालू है.....अच्छी और सुसंस्कृतिक पृष्ठभूमि के होने के बाद भी राज अगर इस तरह की आग उगल रहे हैं, तो उन लोगों के बारे में क्या कहेंगे जो निरा मुर्ख हैं.....जहां काम देखते हैं वहां चले आते हैं....दबा कर काम करते है, सोते हैं और फिर वहीं के हो कर रह जाते हैं....राज को शायद नहीं पता है कि बिहारियों को ये बताते हुए कितनी खुशी होती है कि वो मुंबई या दिल्ली में रह रहे हैं....और न ही उन्हें इस बात की जानकारी लगती है कि काम करने वाले के लिए कहीं भी काम है....और इससे भी ज्यादा शर्मिंदगी की बात तो बिहार और यूपी के शासकों के लिए है जो बार बार इस तरह की फजीहत सुनने के आदी हो गए हैं.....इन्हीं वजहों से कई बार शासक और शोषित का अहसास होता है....
और अव्वल तो ये कि फ़िलहाल जो देश की हालत है...एक पूरा प्रदेश मौत के मंजर से गुजर रहा है और पड़ोसियों को इस कराह का अहसास तक नहीं है.....उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि आतंकवाद से कैसे निबटा जाए....

हमें देखना है और हम देखेंगे वाले नेता जाने और क्या क्या देखना चाहते हैं....इस देश में हर चार महीने में बाद एक शहर बर्बाद हुआ जा रहा है....और इनको इस बात कि चिंता खाए जा रही है कि किसके हिस्से की रोटी किसने खाई....अरे ज़नाब हर आदमी अपने हिस्से की ही रोटी खाता है...जरा देखिये तो बिहार यूपी के लोगों के दिल्ली में आने से कितने तो -नए नए बिजनेस दिल्ली मुंबई वालों को बैटे बिठाले मिल गए हैं.....जिन घरों में बिजली नहीं...ताज़ा हवा नहीं उन घरों के किराये मास्सा अल्लाह.....कभी किसी बिहार यूपी वालों ने अपने प्रदेश के सरकार से इस बात की शिकायत नहीं की होगी...हम जितना कमाते हैं वो वहीं रह जाता है....
दिल्ली एक प्रदेश होने की वजह से इतना संपन्न नहीं है....यह सभी प्रदेशों का केंद्र है....ये राजनेता जिस बात पर चिल्ला रहे हैं उन्हें नहीं पता कि इसके लिए जिम्मेदार भी वही हैं क्यों नहीं दिल्ली मुंबई के अलावा दूसरे राज्यों में उद्योग लगाए जाते हैं......इस बात पर जोर बनाए राज टाकरे...संसद तक पहुंचाए अपनी बातों को कि बिहारियों के लिए उद्योग की व्यवस्था हो....

मुन्ना की दादी


आज सुबह से ही रो रहा है मुन्ना
लगता है दादी की याद आ रही है
बहुत खुश होता था मुन्ना
जब गोधूलि बेला होते ही
वह बुढ़िया दादी के सीने से जाकर दुबक जाता था
आंचल को इकठ्ठा कर हाथ में कसकर दबा लेता था
उसकी अम्मा लाख कहती
बुढ़िया,
कर्कस आवाज वाली बुढ़िया
तूं मेरे बच्चे को बीमार कर ही देगी
डायन की तरह पीछे पड़ी रहती है
बुढ़िया,
लेकिन बुढ़िया मुन्ना की दादी थी
उसे कहानियां लोरियां सुनाने वाली दादी
नन्हे हाथों से पैर दबाने पर
गुड़ का टुकड़ा देने वाली दादी
मुन्ना ढूंढता है अपनी दादी को
आज भी वैसे ही
मरी नहीं है उसकी दादी
इतना तो उसे पता है
क्योंकि दादी की कहानियों में कई बार मरती थी दादी
कभी सोनू की कभी मोनू और पिंटू की...
और वो तारा बन जाती थी
लेकिन, उसकी दादी तारा नहीं बनी है
मुन्ना खूब सोच रहा है...
उसकी दादी कहां गई होगी ?

स्कूल से आते ही
भाग कर जाता है उस छोटे सांकल कमरे में
"दादी"...
"आ गया मुन्ना तूं"
कितना सुनना चाहता है मुन्ना ये
लेकिन उसे कौन देगा ये जवाब
मुन्ना को कौन बताएगा
उसकी दादी तारा नहीं बनी
तो कहां गई...
दादी ने भी तो कभी नहीं बताया था उसे
दादी तारा नहीं बनती तो कहां चली जाती है.....
ये शायद मुन्ना को उसकी अम्मा और अब्बू ही बताएंगे एक दिन
कि दादी के लिए एक और भी जगह होती है...
जहां उसे मरने के पहले छोड़ दिया जाता है...
मुन्ना, उसे वृद्धाआश्रम कहते हैं...

















Sunday, May 11, 2008

कौवा की आएगी बारात...पर ज़रा देर लगेगी यार

एक हमारे कौवा दोस्त हैं.....दरअसल नाम तो कुछ और है..लेकिन उन्हें हम लोग कौवा कहते हैं...कौवा इसलिए क्योंकि उनका रंग काला है....वैसे मैं कहीं से भी उनके नाम के साथ हुए इस षडयंत्र का हिस्सा नहीं हूं...लेकिन मैने भी जब पहली बार अपने दोस्तों से सुना कि फलाने का नाम कौवा है तो लगा ‘ सही है यार इसका नाम तो कौवा ही होना चाहिए था’ इससे ज्याद भूमिका नहीं है मेरी उसे कौवा का नाम देने में....वैसे उसका एक और नाम है...हमलोग उसे प्यार से गणित भी कहते हैं....आजकल हमारे गणित मित्र भी ब्लॉग लिखते हैं....दरअसल दोनो निक नामों को सुनकर चाहे जितना खराब लग रहा हो लेकिन उसपर बैठती बिल्कुल ठीक है....जैसे कि कौवा....काला सा बिल्कुल चालाक बनने की कोशिश करता हुआ अधेड़ उम्र का...मतलब मर्द बनता हुआ लड़का या फिर मर्द बनने के बाद बूढ़ा होता हुआ मर्द.... कौवे जितना तेज़...अब आप जानते ही हैं कि कौवा कितना तेज़ होता है...और किस तरह का तेज़ होता है....मेरा मित्र भी कुछ ऐसा ही है....गणित इसलिए क्योंकि वो जोड़-घटाओ करने में बड़ा माहिर है लेकिन आजतक एक भी सवाल हल नहीं कर सका है....बोलता खूब है...किसी भी मंच की शोभा बढ़ाने लग जाता है....बीच में से कहीं से उठकर एक सास्वत सवाल....और उसके बाद सब का मूंह बंद करवाते देते हैं हमारे कौवा मित्र....अब उनको क्या पता कि प्रधानमंत्री को भी पता है कि देश में गरीबी है...उन्हें इंडिकेट करने की जरूरत नहीं...ज़नाब
खुद वित्तीय मामलों के अच्छे जानकार लेकिन अपने कौवा जी उनको भी सलाह दे देंगे....अब लीजिए....ऐसे में क्या कर सकते हैं....अभी कुछ दिनों पहले हमारे गणित मित्र उर्फ कौवा को प्रेम हो गया...अब कौवा को प्रेम हुआ तो कांव कांव शुरू....सुनने वाले कौन...हम कौवा के दोस्त.....कौवा से भी गए गुजरे....प्रेम दीवाने कौवा को न रात दिखे न दिन....कौवा को लड़की से प्रेम हो गया भई...ब्रेकिंग न्यूज......अब ये ठहरा कौवा प्रेम तो किसी कौवी से करना था....लड़की से कर बैटे...दूसरी बिरादरी में टांग फसाने की इनकी आदत ज़रा पुरानी है क्या कीजिएगा....गणित जी हमेशा फंस जाएंगे...अब बचाइये....लड़कीयन ऐसी कि लूट लिया हमरे कौवा दोस्त को....बेचारा कौवा हमारा खूब रोया....बिलबिला बिलबिला के....अरे हम सबने मिलकर कई बार और खूब समझाया था कि कि देखो गणित कभी दिल विल मत दे बैठना...घूमते फिरते हो सो तो सही है लेकिन ये दिल का मामला बड़ा खराब होता है....और तुम ठहरे काले कलूटे...तुमसे कोई लड़की वो भी इस महानगर में प्यार व्यार नहीं करेगी..धोखा खा जाओगे कौवे इस चक्कर में मत पड़ना लेकिन नहीं । कर दी गलती...आजकल पछता रहे हैं....हम लोग चुप करा करा के थक गए हैं...हमारे कौवा के आंसू खत्म नहीं हो रहे...कौवा को नहीं पता है माया महा ठगिनी होती हैं...माया के चक्कर में पड़ गया बेचारा....कौवा को उसी के घर दफ्तर से निकलवा दिया माया महाठगिनी ने...आजकल कौवा जी बड़े उदास रहते हैं.... लेकिन हौसला नहीं खोये हैं...अब उन्होंने फैसला कर लिया है कि वो अपने गांव की किसी कौवी से ही ब्याह रचाएंगे....लेकि ये क्या भई कौवे की किस्मत को तो जैसे हम आदम की नज़र ही लग गई है....रिश्ते पर अभी हमारे कौवा मित्र बहुत्ते इतराये भी नहीं थे...एकाध गणित भी नहीं झाड़े थे कि रिश्तवे टूट गया....इस बार हमारे कौवा की फिर कोई गलती नहीं थी...कौवा बेचारा क्या करेगा भला....उस दिन तो सुना ही रहा था कि हमको लड़की तो मिली लेकिन एकदम काली...जैसे कौवी...अब उसे क्या पता कि वो कोई कौवा से कम नहीं है...शादी हो रही है ये क्या कम है....इसी बीच गणित की नौकरी टें हो गई और उधर रिश्ता फिस्स....कौवा आजकल करियर पर ध्यान दे रहे हैं....सुनते हैं अब माया के चक्कर में नहीं पड़ेंगे...वैसे हमें लगता है कि उनको ये सब इसलिए भुगतना पड़ रहा है क्योंकि उन्होंने बहुत साल पहले एक भली लड़की का दिल तोड़ दिया था...लड़की ने शादी के लिए कहा तो कौवा सज्जन ने कह दिया कि- मैं सज्जन पुरुष मैं शादी ब्याह माता पिता के बगैर मर्जी नहीं कर सकता ये तो हमारे मां बाप जहां कराएंगे वहीं करेंगे....हमको तो सिर्फ दूसरों की दुनियां लूटने का अधिकार है..इश्क करने का...लड़की को उल्लू बनाने का और मार्केट में गर्लफ्रेंड के नाम का स्टेटस सिंबल बनाने का अधिकार है....शादी के लिए जो लड़की होती है वो सुसंस्कारी...सुलोचनी...और ब्ला ब्ला ब्ला...होती है....उसे मोटा दहेज भी लाना होता है...ये सब हमारे कौवा दोस्त ने उस लड़की से कहा था...बेचारा कौवा अब तो कोई कौव्वी भी नहीं मिल रही है उसे...इसी बीच ख़बर आ गई है कि लड़कियों का जन्म दर तेज़ी से गिर रहा है..लड़कियां घट रही है...हमारे कौवा मित्र की चिंता और बढ़ गई है....

मेरी दुनिया हैं 'मां'

कल रात खाना खाते घुप्प अंधेरा छा गया...दरअसल बिजली चली गई थी....चुंकि हमारे इलाके में बिजली जाती नहीं है इसलिए विकल्प के तौर पर कोई वयवस्था नहीं थी...आंखों के आगे छाये अंधेरे में हाथ को हाथ नहीं दिखने लगे...
इस बीच किसी का फोन आ गया तो मोबाइल से रौशनी कमरे में फैल गई...शुक्र....वरना मैं तो समझ ही नहीं पा रही थी ये क्या हो गया...मोबाइल की रौशनी के सहारे कैंडल ढूंढना शुर किया....शायद मिल जाए....वैसे मैं वो चीज ढूंढ रही थी जिसके होने की कोई गुंजाईश नहीं थी....लेकिन फिर लगा कि ढूंढा जाए कभी ले आए हों....और मुझे मोमबत्ती का एक टुकड़ा खुदा की तररह मिल गया...या अल्लाह...मेरी खुशी के बारे में पूछिये मत कैंडल लाइट डिनर...वाह.....
मोमबत्ती जलते ही जिस हाथ को दूसरा हाथ नहीं दिख रहा था उसे मुंह भी दिखने लगा....बहुत मजा आ रहा था...लाइट जाने के बाद जो परेशानी खड़ी हो गई थी....कैंडल लाइट डिनर ने सब खत्म कर दिया....नो प्लानिंग और कैंडल डिनर...कौन नहीं खुश होगा.....लेकिन जैसे ही कौर मुंह में गया...भक से रौशनी जगमगा गई....ओह ये तो बिजली है यार...भला कोई बिजली आने से इतना दुखी होता है...लेकिन मुझे बहुत दुख हुआ था...अगर ये पता होता कि बिजली ये गई और वो आई वाले हिसाब में गई है तो मैं क्यों इतनी परेशान होती.....बिजली के सामने कैंडल जैसे बाघ के सामने मेमना.....मैं कैंडिल बुझाना भूल गई...अनमने ढंग से खाये जा रही थी...फिर कैंडिल पर ध्यान गया...तो फूंक मार कर उसे बुझाने के लिए लपकी....लेकिन फौरन वापस हुई....मोमबत्ती को जलता ही छोड़ दिया...दरअसल ,छुटपन में मां कहती थी कि मोमबत्ती मुंह से नहीं बुझाना चाहिए....इसलिए जैसे ही मोमबत्ती की तरप बढ़ी मुझे मां कि बात याद आ गई...मां हमेशा कहती हैं कि आग ब्रम्हा है..सबसे ईश्ट देवता...उन्होंने हमें जन्म दिया है...उसमें मूंह नहीं लगाना चाहिए.....उन्हें जूठा नहीं करना चाहिए...इसलिए मैने मोमबत्ती बुझाई नहीं....और खाना, खाना भी बंद कर दिया...मन भर के रो लिया....मां की और भी ढेर सारी बातें याद आने लगी...सोचने लगी कि मां कि बातें कितनी यात्रा करती है..ज़ेहन में बैठ जाती है....हजारों मील दूर होकर भी हम उनके सिखाये पर अमल करने को बेबस हो गए....क्या फर्क पड़ता अगर मैं कैंडिल मूंह से बुझा ही देती....वो देखने तो आ नहीं रही थी लेकिन कहां कर पाई ऐसा....हम लाख बड़े हो गए हों....लाख एडवांस हो गए हों, लेकिन मां की बातें आज भी हमे अपनी परंपराओं अपनी संसकृति से जोड़े रखती है....मां को याद कर के खूब रो लिया..तो घर के और लोग भी याद आने लगे...आस पड़ोस भी याद आया....और बस रात यूं ही गुजर गई...कुर्सी पर बैठे- बैठे...कैंडिल कब बुझ गया पता नहीं चल पाया..

बड़े हो जाने का भी अफसोस होने लगा....दिल कचोटने लगा...घर जाने को मन मचलने लगा....मां से बात करने को उतावली हो गई....सुबह हो ही गई थी....मां को फोन किया....मां ने कहा दिल्ली में लाइट तो रहती है न...समाचार में सुना है वहां भी बिजली जाने लगी है....सुनो इस बार तुम्हारे सूटकेस में एक टार्च भी रख दिया था...उसके बाहर वाले पॉकेट में बैट्री भी रखी है....लगा लेना...लाइट वाइट चली जाए तो काम आएगा.....
ये होती हैं मां....अपने बच्चों की जिंदगी में रौशनी भरती हुई....

Monday, May 5, 2008

बच्चन अंकल दो लाख रुपये दे दो...कर्ज चुकाना है

अमिताभ बच्चन ने ब्लॉग बनया तो इस दुनिया में एक नयी हलचल हुई किसी ने कहा कि अमिताभ जी का ब्लॉग मतलब कुछ भी रियल नहीं सबकुछ फिल्मी...हमने अपने ब्लॉग पर लिखा कि अमिताभ बच्चन के ब्लॉग का स्वागत करें.....किसी ने टिप्पणी में लिखा कि जी आपका तो स्वागत है लेकिन अमिताभ बच्चन का नहीं....खैर...लेकिन मुझे लगता है बच्चन जी आते ही छा गए...जितना बड़ा उनका पोस्ट नहीं उससे कहीं ज्यादा बड़ी टिप्पणी आने लगी...पता नहीं कैसे पढ़ पाते होंगे बच्चन साहब...उन्होंने ब्लॉग की दुनिया में कदम रखा...तो अखबारों और टीवी चैनल की सुर्खियां बन गई...इंटरटेंटमेंट वाले तो हर रोज बिग अड्डा पर अड्डा जमाने लगे....क्योंकि अमिताभ जो बोलदे वो ख़बर है...हर रोज कुछ न कुछ मिल ही जाता है....मतलब हर ख़बरों का नया स्रोत अमिताभ बच्चन का ब्लॉग इससे भी अव्वल ये कि ब्लॉग पर आते ही अमित जी ने ऐसे ऐसे मसलों पर लिखा कि उसे ख़बर होना ही था....कम बोलने वाले अमिताब बच्चन जब बोलते हैं तो ऐसे ही बोलते हैं.....शत्रुघन सिन्हा पर अपनी भड़ास निकाल दी....अगले दिन रामडॉस को लपेट लिया...बिग अड्डा ख़बरों का अड्डा हो गया....रोज एक ख़बर तो यहां से मिलती ही है...एंटरटेंटमेंट वाले थोड़ी मेहनत करे तो अमित जी की पोस्ट पर दी गई टिप्पणी में ख़बर होती है है...जैसे एक लड़के ने अमित जी को लिखा है कि आप दानी महान हैं...हमारी मदद करें...हमने एडुकेशन लोन लिया था उसे वापस करना है...प्लीज अमित अंकल हमें दो लाख रुपये दे दीजिए....मैं आपका बड़ा अभारी रहूंगा....अब ये तो अमित जी पर निर्भर करता है कि वो क्या करेंगे....लेकिन जिनके एक एक पोस्ट पर हजार के आस पास टिप्पणी आती हो...उनकी नज़र क्या इस टिप्पणी पर पड़ेगी....पड़ जाए तो शायद अमिताभ बच्चन कुछ मदद तो कर ही देंगे...वैसे हम दुआ करते हैं कि अमित जी कि दया दृष्टि जल्द पड़े.....ताकि किसी का भला हो सके............

Tuesday, April 29, 2008

जाति की आग में झुलस गई बच्ची....


हमारे एक मित्र को इस बात की बड़ी चिंता रहती है कि सुबह सुबह जो बुलेटिन आता है....उसमें खून ख़राबें की खबरें नहीं होनी चाहिए....वो जब भी मिलते हैं हमें ये सलाह जरूर देते हैं...यार क्राइम व्राइम मत दिखाया करो तुम टीवी वालों को पता नहीं क्या नशा चढ़ा रहता है..अरे यार सुबह सुबह तो कुछ अच्छी ख़बरें दिखाया करो.....लीजिए उनके गले में घंटी कौन बांधे..कौन बताए कि हम टीवी वाले तो ख़बर नहीं चलाएंगे लेकिन अख़बार, जो सुबह सुबह आता है...उसमें क्राइम की ख़बरें क्या सेंसर कर के पढ़ोगे...सुबह सुबह के बुलेटिन को हल्का रखने की कोशिश तो हर न्यूज चैनल में की जाती है.... कम से सुबह कि बुलेटिन के फस्ट सेगमेंट में तो इस बात का तकरीबन हर जगह खयालरखा जाता है कि हिंसा न परोसी जाए... कौन चाहता है कि सुबह सुबह लोगों के मन को ख़राब किया जाए....लेकिन अपने देश का क्या करोगे भईया....लोगों को कैसे रोकोगे.....जहां हर दूसरे मिनट एक से बढ़कर एक क्राइम होता है....आज भी मुझे लगता है जब सुबह की पहली बुलेटिन बन कर तैयार हो गई होगी..या होने वाली होगी...तो ख़बर आई मथुरा से....एक छह साल की दलित लड़की को आग में फेंक दिया...बच्ची की हालत इस कदर खराब थी कि पूछिये मत.....अब बताइये क्या करेंगे आप...लोगों को नहीं बताएंगे कि उनके देश में क्या हो रहा है....क्या बताएंगे उथप्पा ने कैसे मुंबई इंडियंस को जीत दिलाई.....या फिर ये बताएंगे कि साइमंड्स वतन लौट गए हैं....लोगों को मुगालते में रखा जाए कि देखो देखो हमारे देश में कितनी शांति है.....अरे भाई बोओगे कांटा तो आम थोड़े ही खाओगे.....जो देश क्राइम करता है उसे देखने के लिए भी तो वही दिया जाएगा न....अब भला उस मासूम सी बच्ची का ऐसा क्या कसूर हो सकता है कि उसे आग में झौंक दिया जाए.....तो भई कसूर भी जान लीजिए बच्ची अपनी माता जी के साथ किसी सवर्णों वाले इलाके से गुजर रही थी.... अब इस नन्ही सी उम्र में उसे क्या पता कि जाति की आग क्या होती है....लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है....फर्क पड़ता है साहेब अब अगर कहीं दलित भड़क गए (जो बहुत संभव है ) तो वो सवर्णों को बस्तियां फूंक डालेंगे....या फिर उनके भी किसी मासूम बच्चे को मार डालेंगे काट डालेंगे....मेरे दोस्त ख़बर दिखाने वाले को तो समझा दिया.......जरा जाओ यार उनके भी ज़ेहन में उतरो जो इस तरह भोर की शुरुआत ही बच्ची को आग में झौंकने से करते हैं.....