मैं तो अख़बार में कुछ और ढूंढ रही थी। नहीं मिला। जो मिला उसकी अपेक्षा कहीं से नहीं थी।
इतना रोमांचक मैच...उसपर सचिन के 175 रन...आखिर जोशी जी चुप कैसे रह सकते थे... क्रिकेट खासकर सचिन की बारिकी से वाकिफ जोशी साहब हमेशा इस तरह के रोमांचक मैच के बाद जमकर लिखते थे...लेख पढ़कर मजा आ जाता था...लेख पढ़ने के बाद काफी देर तक मैं ये सोचती रह जाती थी कितना बढ़िया समझते हैं जोशी जी सचिन को...उनके लेखों से ये भी लगा कि शायद सचिन को बहुत प्यार भी करते हैं...
फिर मैं सोचती अगर प्रभाष जी पत्रकार नहीं होते तो क्या होते? निसंदेह, अदभुत क्रिकेटर होते...
कितना दुर्भाग्यपूर्ण है ये जानना कि वो अब नहीं रहे... लेकिन जीवन के अंतिम पलों में भी सचिन उनके साथ थे...क्रिकेट उनके साथ था...
पत्रकारिता जगत उनके योगदान को कभी भूल नहीं सकता...सहज और सरल भाषा से पत्रकारिता का परिचय कराने वाले जोशी साहब इस तरह से, अचानक से चल पड़ेंगे ये अब भी ग्रहण नहीं कर पा रही हूं...
उनको मेरा नमन
Friday, November 6, 2009
Thursday, August 13, 2009
सफर खत्म हुआ लेकिन...
वो कहीं से भली नहीं थी, उसकी क्रूरता, उसके चेहरे पर दिख रही थी। मेरा मन कह रहा था कि उससे दूर रहूं। उसे न देखूं। लेकिन नज़र थी कि बार बार उधर चली जा रही थी। एकाध बार उसने भी मुझे देखा था। वो मेरी तरफ देखकर क्या सोच रही थी ये मुझे नहीं पता था, लेकिन मैंने जब भी उसकी तरफ देखा सिर्फ एक बात सोच रही थी कोई इतनी क्रूर हो सकती है क्या, कि उसकी क्रूरता उसके चेहरे से दिखने लगे? वो भी एक औरत। लेकिन मुझे इसबात पर कोई संदेह नहीं था कि वो क्रूर थी। और भयानक भी। सफ़र में उसका पति उसके साथ था। उतना ही सुंदर। काफी साधारण छह फीट का लंबा चौड़ा भरे बदन का शख्स। उसे देखकर लग रहा था कि वो अपनी पत्नी से बहुत डरता है। अलबत्ता, ये कहें कि बिना पत्नी की इजाजत के वो कुछ भी नहीं करता होगा।
हालांकि, पहली नज़र में जब मैने उस शख्स को देखा तो मुझे ये लगा कि ये आदमी कितना बदकिस्मत है कि इतना सुंदर होने के बावजूद उसे ऐसी कुरूप पत्नी मिली है? मेरे मन ने तकरीबन ये मान लिया था कि जरूर इस शख्स ने कभी बहुत बड़ा पाप किया होगा। वरना ऐसा तो आमतौर पर नहीं होता। लेकिन धीरे-धीरे बात समझ में आई कि दरअसल वो एक दब्बू किस्म का व्यक्ति था जिसे शायद मां-बाप के दबाव में आकर उस महिला से विवाह करना पड़ गया होगा। और बाद में पत्नी बनी उस महिला ने उसे और भी दब्बू बना दिया होगा।
महिला मुझसे काफी दूर बैठी थी, लेकिन मेरे भीतर उसका डर दूर तलक बैठ गया था। उसे देखते ही लगता था कि जैसे पता नहीं किस बात पर वो तेज चीख पड़ेगी। पता नहीं अभी क्या बोल पड़ेगी। इसिलए मैं तो पहले ही दुबक कर बैठ गई थी। लेकिन मन था कि वो लगातार उस महिला का तरह तरह से वश्लेषण कर रहा था। सफर थी, नींद थी और रात थी, लेकिन मेरे भीतर भय था। उस महिला का भय। पता नहीं वो कैसा भय था। हालांकि मुझे बार बार ये भी लग रहा था कि महिला का भय बिला वजह मेरे भीतर घुस आया है। आखिर किसी को देखकर, सुनकर कैसे ये तय किया जा सकता है कि वो इतना क्रूर होगी? मैं गलत हूं। नहीं, नहीं ये औरत शायद किसी के लिए तो अच्छी होगी? शायद ये अपनी पिता की लाडली होगी, इसीलिए इतना बिगड़ गई है। लेकिन इस विश्लेषण पर मन ज्यादा देर तक ठहरा नहीं। मुझे लगा कि ये क्रूर महिला कुछ तो अच्छा करती होगी? वो क्या हो सकता है? क्या वो बैंगन का भुरता अच्छा बनाती होगी? अधेड़ उम्र की महिला है इसके बच्चे होंगे? ये अपने बच्चे को कैसे पुचकारती होगी? इसके चेहरे पर तो ममत्व दूर दूर तक नहीं है। हाय तो क्या इसके बच्चे मातृ प्रेम के लिए तरस जाते होंगे? लेकिन अगर ऐसा होता होगा तो इसमें बच्चे का क्या कसूर? वैसे उसके पति का भी क्या कसूर? पति का कसूर तो हो भी सकता है क्योंकि एक पुरुष होने के नाते उस शख्स ने कभी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी होगी। उसकी शख्सियत वैसी थी भी, वो कामचोर दिखता था।
लेकिन बच्चे? उनका क्या कसूर?
इतना सबकुछ सोचते समझते और खामखा एक बात को लेकर खिचड़ी पकाते हुए सुबह हो गई? चाय पीने के लिए मैं ऊपर वाले बर्थ से नीचे उतरी, और चाय का प्याला लेकर बैठने लगी। मुझे उसवक्त ये खयाल नहीं आया कि मैं उसी महिला की बगल में बैठ रही हूं जिसे लेकर मैने पारदिन इतना बुरा बुरा सोचा था। बैठने के लिए मैने बर्थ पर पड़ी चादर सरका दी।
'यहां मत बैठो'
कड़क आवाज़, मैं बैठते-बैठते वापस खड़ी हो गई। ये उसी महिला की आवाज थी।
जिसके बारे में मैने बिना उसके कुछ बोले काफी वश्लेषण कर लिया था। तीनो बर्थ खाली होने के बावजूद उस महिला ने मुझे वहां बैठने नहीं दिया।
उसकी बात का मुझे जरा बुरा नहीं लगा। लेकिन मैने ये जरूर सोचा कि उससे ये तो कह ही दूं कि तुम ऐसा कहोगी इसकी ख़बर मुझे थी। मुझे पता था कि तुम इसी स्वभाव की हो। तुम्हारी क्रूरता तुम्हारे चेहरे तक पर उकर आई है। इसका आभाष तुम्हें नहीं है।
मैं हंसते हुए ऊपर वाली बर्थ पर चली गई। मैने उस महिला के बारे में जो कुछ विश्लेषण किया था, वो सच था। ये उसने खुद बता दिया। वरना उस खाली बर्थ पर मैं बैठ ही जाती तो क्या हो जाता? वो सीट मेरी भी थी। दिन हो चुका था। आखिर ऊपर बर्थ वाला कहां जाता? इसी बीच टिकट जांच करने के लिए टीटी आ गया। उससे पता लगा कि जिस लोवर बर्थ पर वो बैठी थी और सामने वाले लोवर बर्थ पर उसका पति बैठा था, वो दोनो ही बर्थ उसकी नहीं थी। उसका बर्थ मिड और अपर था जिसे उसने बनावटी भोलेपन से सहयात्री से हासिल किया था। बात जरा सी थी। लेकिन, मुझे उसकी कूबोली का जरा मलाल नहीं है। मैं अब भी इसी बात पर अफसोस कर रही हूं कि वो इतनी क्रूर क्यों थी कि वो क्रूरता उसके चेहरे से दिखने लगी थी। मैं कोई नहीं हूं कि ये कहूं कि उसे वैसा नहीं होना चाहिए था.. लेकिन
हालांकि, पहली नज़र में जब मैने उस शख्स को देखा तो मुझे ये लगा कि ये आदमी कितना बदकिस्मत है कि इतना सुंदर होने के बावजूद उसे ऐसी कुरूप पत्नी मिली है? मेरे मन ने तकरीबन ये मान लिया था कि जरूर इस शख्स ने कभी बहुत बड़ा पाप किया होगा। वरना ऐसा तो आमतौर पर नहीं होता। लेकिन धीरे-धीरे बात समझ में आई कि दरअसल वो एक दब्बू किस्म का व्यक्ति था जिसे शायद मां-बाप के दबाव में आकर उस महिला से विवाह करना पड़ गया होगा। और बाद में पत्नी बनी उस महिला ने उसे और भी दब्बू बना दिया होगा।
महिला मुझसे काफी दूर बैठी थी, लेकिन मेरे भीतर उसका डर दूर तलक बैठ गया था। उसे देखते ही लगता था कि जैसे पता नहीं किस बात पर वो तेज चीख पड़ेगी। पता नहीं अभी क्या बोल पड़ेगी। इसिलए मैं तो पहले ही दुबक कर बैठ गई थी। लेकिन मन था कि वो लगातार उस महिला का तरह तरह से वश्लेषण कर रहा था। सफर थी, नींद थी और रात थी, लेकिन मेरे भीतर भय था। उस महिला का भय। पता नहीं वो कैसा भय था। हालांकि मुझे बार बार ये भी लग रहा था कि महिला का भय बिला वजह मेरे भीतर घुस आया है। आखिर किसी को देखकर, सुनकर कैसे ये तय किया जा सकता है कि वो इतना क्रूर होगी? मैं गलत हूं। नहीं, नहीं ये औरत शायद किसी के लिए तो अच्छी होगी? शायद ये अपनी पिता की लाडली होगी, इसीलिए इतना बिगड़ गई है। लेकिन इस विश्लेषण पर मन ज्यादा देर तक ठहरा नहीं। मुझे लगा कि ये क्रूर महिला कुछ तो अच्छा करती होगी? वो क्या हो सकता है? क्या वो बैंगन का भुरता अच्छा बनाती होगी? अधेड़ उम्र की महिला है इसके बच्चे होंगे? ये अपने बच्चे को कैसे पुचकारती होगी? इसके चेहरे पर तो ममत्व दूर दूर तक नहीं है। हाय तो क्या इसके बच्चे मातृ प्रेम के लिए तरस जाते होंगे? लेकिन अगर ऐसा होता होगा तो इसमें बच्चे का क्या कसूर? वैसे उसके पति का भी क्या कसूर? पति का कसूर तो हो भी सकता है क्योंकि एक पुरुष होने के नाते उस शख्स ने कभी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी होगी। उसकी शख्सियत वैसी थी भी, वो कामचोर दिखता था।
लेकिन बच्चे? उनका क्या कसूर?
इतना सबकुछ सोचते समझते और खामखा एक बात को लेकर खिचड़ी पकाते हुए सुबह हो गई? चाय पीने के लिए मैं ऊपर वाले बर्थ से नीचे उतरी, और चाय का प्याला लेकर बैठने लगी। मुझे उसवक्त ये खयाल नहीं आया कि मैं उसी महिला की बगल में बैठ रही हूं जिसे लेकर मैने पारदिन इतना बुरा बुरा सोचा था। बैठने के लिए मैने बर्थ पर पड़ी चादर सरका दी।
'यहां मत बैठो'
कड़क आवाज़, मैं बैठते-बैठते वापस खड़ी हो गई। ये उसी महिला की आवाज थी।
जिसके बारे में मैने बिना उसके कुछ बोले काफी वश्लेषण कर लिया था। तीनो बर्थ खाली होने के बावजूद उस महिला ने मुझे वहां बैठने नहीं दिया।
उसकी बात का मुझे जरा बुरा नहीं लगा। लेकिन मैने ये जरूर सोचा कि उससे ये तो कह ही दूं कि तुम ऐसा कहोगी इसकी ख़बर मुझे थी। मुझे पता था कि तुम इसी स्वभाव की हो। तुम्हारी क्रूरता तुम्हारे चेहरे तक पर उकर आई है। इसका आभाष तुम्हें नहीं है।
मैं हंसते हुए ऊपर वाली बर्थ पर चली गई। मैने उस महिला के बारे में जो कुछ विश्लेषण किया था, वो सच था। ये उसने खुद बता दिया। वरना उस खाली बर्थ पर मैं बैठ ही जाती तो क्या हो जाता? वो सीट मेरी भी थी। दिन हो चुका था। आखिर ऊपर बर्थ वाला कहां जाता? इसी बीच टिकट जांच करने के लिए टीटी आ गया। उससे पता लगा कि जिस लोवर बर्थ पर वो बैठी थी और सामने वाले लोवर बर्थ पर उसका पति बैठा था, वो दोनो ही बर्थ उसकी नहीं थी। उसका बर्थ मिड और अपर था जिसे उसने बनावटी भोलेपन से सहयात्री से हासिल किया था। बात जरा सी थी। लेकिन, मुझे उसकी कूबोली का जरा मलाल नहीं है। मैं अब भी इसी बात पर अफसोस कर रही हूं कि वो इतनी क्रूर क्यों थी कि वो क्रूरता उसके चेहरे से दिखने लगी थी। मैं कोई नहीं हूं कि ये कहूं कि उसे वैसा नहीं होना चाहिए था.. लेकिन
Sunday, July 26, 2009
हां, सच से डर लगता है
रेखा...भगवती चरण वर्मा का वो उपन्यास जिसे पढ़ने का मौका मुझे कई बार मिला लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से टल गया... रेखा समाज की परतों को खोलती एक अदभुत रचना है...जो हरयुग में अपनी शसक्त मौजूदगी दर्ज कराती रहेगी...
लेकिन दिक्कत ये कि जब मैने इस उपन्यास को पढ़ना शुरू किया, ठीक इसी समय स्टार प्लस पर एक प्रोग्राम शुरू हुआ सच का सामना...दोनो की विषयवस्तु एक, समाज का शारीरिक सच...
रेखा और सच का सामना में हिस्सा ले रही प्रतियोगियों की सच्चाई में फर्क सिर्फ इतना कि रेखा में भगवती चरण वर्मा जी ने जब-जब रेखा को शरीर के लिए कमजोर होते हुए दिखाया है...उसके तुरंत बाद रेखा के तर्क रखे हैं...रेखा क्यों बार-बार किसी पुरुष से संबंध बना लेती है, इसका कारण भी बताया जाता है...हालांकि हर दूसरे पल रेखा को लगता है कि वो गलत कर रही है लेकिन हर अगले पल वो वही करती है...हालांकि, सच का सामना के प्रतियोगी जब-जब सच को बयां करते हैं तब-तब वो बड़े भावुक हो जाते हैं...उन्हें पश्चाताप होता है या नहीं ये पता नहीं...लेकिन चेहरे पर ऐसी लकीरें जरूर खिंच जाती है कि जैसे अगर पैसे का मोह न हो तो वो कभी इस सच को बयां करे ही नहीं...अमूमन समाज में ऐसे सच को बयां करता भी कौन है???
वैसे जीवन की कईएक ऐसी सच्चाई होती है जिसे हम कभी बयां नहीं करना चाहतें...और करते भी नहीं हैं...
पश्चिम की नकल बताई जा रही इस धारावाहिक को बंद करने की मांग उठ रही है...संभव है कि इस प्रोग्राम का पर्दा गिर जाए...अगर ऐसा हुआ तो ये ठीक वैसे ही होगा जैसे कूड़े को बुहार कर दरी के नीचे छिपा देना...
ये बता पाना बड़ा कठिन है कि अगर हम पर्दे पर इस तरह के सच को देखने सुनने लगें तो हमारा क्या होगा? हमारे समाज का क्या होगा? हम पर कितना गलत असर पड़ेगा?
एक बड़ा सवाल यहां ये भी उठता है कि क्या हम पर और हमारे समाज पर सबसे ज्यादा असर टीवी का ही पड़ता है? सच का सामना में जो सवाल पूछे जा रहे हैं और जो उसके जवाब दिए जा रहे हैं, उसका हमपर असर पड़ सकता है ये तर्क उनलोगों की तरफ से दिए जा रहे हैं जो लोग इस प्रोग्राम को बंद कराना चाहते हैं। शायद उन्हें लगता है कि प्रोग्राम बंद होने के बाद समाज की तमाम ऐसी विकृतियां खत्म हो जाएगी...ऐसा करना किसी बुरी चीज को देखकर अपनी आंखे बंद कर लेने जैसा है... हर समाज की अपनी सच्चाई होती है...उसके अपने संस्कार होते हैं...
पांच प्रतियोगयों में अभी तक किसी ने ऐसा जवाब नहीं दिया है कि वो पति या पत्नीव्रता हैं...वो पर स्त्री और पर पुरुष के बारे में सोचते नहीं...ये उनकी अपनी सच्चाई है...ऐसा नहीं है कि एक ने दूसरे से सुन कर, सीख कर कुछ कहा है। सबके अपने अपने अनुभव हैं। ये हमारे बीच के लोग हैं और यकीनन थोड़े हिम्मती भी...वरना, कहां लोग अपनी ज़िंदगी के निजी पन्नों को खोल पाते हैं...ये साहस सबके पास नहीं होता...इसके लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए...और उन्हें अपने से अलग या भिन्न समझने की बिला वजह कवायद नहीं करनी चाहिए...
इतनी हिम्मत तो रेखा में भी नहीं दिखती...वो भी जब पर पुरुष के साथ संबंध बना कर लौटती है तो अपने पति को नहीं बताती...हालांकि इस कोफ्त में वो रात भर जगती है...अपने आंसुओं से अपने बुजुर्ग पति के पैर धोती है...लेकिन कभी बता नहीं पाती...अपने आप में सिर्फ इतना कहती है..शरीर का अपना धर्म होता है....वो मन से हमेशा अपने पति की होती है लेकिन शरीर के लिए न जाने कहां कहां चली जाती है...यूं कहें कि कहां नहीं चली जाती है...पाठक अपने तरीके से रेखा को बयां करते हैं...रेखा आत्मिक रूप से जितनी पवित्र है शरीर को लेकर उसकी मानसिकता उतनी ही घटिया...लेकिन आदमी तो शरीर और मन का मेल है...वो पूरा ही तभी होता है...ये आप पर निर्भर करता है कि आप किसे तवज्जो देते हैं? शरीर को आत्मा को दिमाग को? या फिर रेखा की तरह समय के साथ साथ अलग अलग चीजों को...
रेखा जमाने पहले लिखी गई है...सच का सामना आज का सच है...लेकिन दोनो में रत्ती भर का फर्क नहीं है...क्यों??? शायद समाज से बड़ा होता है व्यक्ति...व्यक्ति जो प्रकृति का हिस्सा है...और रेखा के शब्दों में शरीर का अपना धर्म होता है....समाज का अपना...और सच दोनो है...जो अलग अलग समय पर तवज्जो पाता है...
सच का सामना....में जो प्रतियोगी आते हैं अगर उन्हें अपना सच बयां करने में आपत्ति नहीं है तो हमें क्या परेशानी हो सकती है, ये समझ से परे है...रही बात ये कि इसका समाज पर बड़ा बुरा असर पड़ेगा..बच्चे बिगड़ जाएंगे, हम बिगड़ जाएंगे.. तो ऐसा भी नहीं होता है...देश में पिछले दशक में ना जाने कितने धार्मिक चैनल खुले हैं लेकिन उस तेज़ी में क्यो लोग धार्मिक हुए हैं???
लेकिन दिक्कत ये कि जब मैने इस उपन्यास को पढ़ना शुरू किया, ठीक इसी समय स्टार प्लस पर एक प्रोग्राम शुरू हुआ सच का सामना...दोनो की विषयवस्तु एक, समाज का शारीरिक सच...
रेखा और सच का सामना में हिस्सा ले रही प्रतियोगियों की सच्चाई में फर्क सिर्फ इतना कि रेखा में भगवती चरण वर्मा जी ने जब-जब रेखा को शरीर के लिए कमजोर होते हुए दिखाया है...उसके तुरंत बाद रेखा के तर्क रखे हैं...रेखा क्यों बार-बार किसी पुरुष से संबंध बना लेती है, इसका कारण भी बताया जाता है...हालांकि हर दूसरे पल रेखा को लगता है कि वो गलत कर रही है लेकिन हर अगले पल वो वही करती है...हालांकि, सच का सामना के प्रतियोगी जब-जब सच को बयां करते हैं तब-तब वो बड़े भावुक हो जाते हैं...उन्हें पश्चाताप होता है या नहीं ये पता नहीं...लेकिन चेहरे पर ऐसी लकीरें जरूर खिंच जाती है कि जैसे अगर पैसे का मोह न हो तो वो कभी इस सच को बयां करे ही नहीं...अमूमन समाज में ऐसे सच को बयां करता भी कौन है???
वैसे जीवन की कईएक ऐसी सच्चाई होती है जिसे हम कभी बयां नहीं करना चाहतें...और करते भी नहीं हैं...
पश्चिम की नकल बताई जा रही इस धारावाहिक को बंद करने की मांग उठ रही है...संभव है कि इस प्रोग्राम का पर्दा गिर जाए...अगर ऐसा हुआ तो ये ठीक वैसे ही होगा जैसे कूड़े को बुहार कर दरी के नीचे छिपा देना...
ये बता पाना बड़ा कठिन है कि अगर हम पर्दे पर इस तरह के सच को देखने सुनने लगें तो हमारा क्या होगा? हमारे समाज का क्या होगा? हम पर कितना गलत असर पड़ेगा?
एक बड़ा सवाल यहां ये भी उठता है कि क्या हम पर और हमारे समाज पर सबसे ज्यादा असर टीवी का ही पड़ता है? सच का सामना में जो सवाल पूछे जा रहे हैं और जो उसके जवाब दिए जा रहे हैं, उसका हमपर असर पड़ सकता है ये तर्क उनलोगों की तरफ से दिए जा रहे हैं जो लोग इस प्रोग्राम को बंद कराना चाहते हैं। शायद उन्हें लगता है कि प्रोग्राम बंद होने के बाद समाज की तमाम ऐसी विकृतियां खत्म हो जाएगी...ऐसा करना किसी बुरी चीज को देखकर अपनी आंखे बंद कर लेने जैसा है... हर समाज की अपनी सच्चाई होती है...उसके अपने संस्कार होते हैं...
पांच प्रतियोगयों में अभी तक किसी ने ऐसा जवाब नहीं दिया है कि वो पति या पत्नीव्रता हैं...वो पर स्त्री और पर पुरुष के बारे में सोचते नहीं...ये उनकी अपनी सच्चाई है...ऐसा नहीं है कि एक ने दूसरे से सुन कर, सीख कर कुछ कहा है। सबके अपने अपने अनुभव हैं। ये हमारे बीच के लोग हैं और यकीनन थोड़े हिम्मती भी...वरना, कहां लोग अपनी ज़िंदगी के निजी पन्नों को खोल पाते हैं...ये साहस सबके पास नहीं होता...इसके लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए...और उन्हें अपने से अलग या भिन्न समझने की बिला वजह कवायद नहीं करनी चाहिए...
इतनी हिम्मत तो रेखा में भी नहीं दिखती...वो भी जब पर पुरुष के साथ संबंध बना कर लौटती है तो अपने पति को नहीं बताती...हालांकि इस कोफ्त में वो रात भर जगती है...अपने आंसुओं से अपने बुजुर्ग पति के पैर धोती है...लेकिन कभी बता नहीं पाती...अपने आप में सिर्फ इतना कहती है..शरीर का अपना धर्म होता है....वो मन से हमेशा अपने पति की होती है लेकिन शरीर के लिए न जाने कहां कहां चली जाती है...यूं कहें कि कहां नहीं चली जाती है...पाठक अपने तरीके से रेखा को बयां करते हैं...रेखा आत्मिक रूप से जितनी पवित्र है शरीर को लेकर उसकी मानसिकता उतनी ही घटिया...लेकिन आदमी तो शरीर और मन का मेल है...वो पूरा ही तभी होता है...ये आप पर निर्भर करता है कि आप किसे तवज्जो देते हैं? शरीर को आत्मा को दिमाग को? या फिर रेखा की तरह समय के साथ साथ अलग अलग चीजों को...
रेखा जमाने पहले लिखी गई है...सच का सामना आज का सच है...लेकिन दोनो में रत्ती भर का फर्क नहीं है...क्यों??? शायद समाज से बड़ा होता है व्यक्ति...व्यक्ति जो प्रकृति का हिस्सा है...और रेखा के शब्दों में शरीर का अपना धर्म होता है....समाज का अपना...और सच दोनो है...जो अलग अलग समय पर तवज्जो पाता है...
सच का सामना....में जो प्रतियोगी आते हैं अगर उन्हें अपना सच बयां करने में आपत्ति नहीं है तो हमें क्या परेशानी हो सकती है, ये समझ से परे है...रही बात ये कि इसका समाज पर बड़ा बुरा असर पड़ेगा..बच्चे बिगड़ जाएंगे, हम बिगड़ जाएंगे.. तो ऐसा भी नहीं होता है...देश में पिछले दशक में ना जाने कितने धार्मिक चैनल खुले हैं लेकिन उस तेज़ी में क्यो लोग धार्मिक हुए हैं???
Saturday, July 18, 2009
तुम आओगे दोस्त
चंद लफ़्ज अब भी है मेरे पास
तुम आओं तो कहूं...
आओ न एक बार
मिलकर बैठें
वैसे ही...
सच पर डालकर पर्दा
देखें सपने जैसा कुछ-कुछ
तुम्हे याद है
क्या-क्या हम सोचा करते थें
देखते-देखते सच हो गए सारे
और हकीकत गुम गया
आओ न!
बैठें,
बातें करें...
शायद दूर हो जाए भ्रम
इस बात का,
कि सपनों के पीछे भागना सच नहीं है
बड़ी कसक है दोस्त...
खैर छोड़ो...
तुम्हें याद है
जब तुमने फोन पर कहा था
जान, कैसे आउं
पैसे खत्म हो गए हैं
फिर तुमने कहा
आने का मन भी है
क्या करूं?
और तुम आ गए थे न
पैसे उधार मांगे थे दोस्त ?
अब तो अपनी गाड़ी भी है तुम्हारे पास
फिर क्यों नहीं आते
आओ न एक बार
चंद लमहें उधार लेकर...
तुम आओं तो कहूं...
आओ न एक बार
मिलकर बैठें
वैसे ही...
सच पर डालकर पर्दा
देखें सपने जैसा कुछ-कुछ
तुम्हे याद है
क्या-क्या हम सोचा करते थें
देखते-देखते सच हो गए सारे
और हकीकत गुम गया
आओ न!
बैठें,
बातें करें...
शायद दूर हो जाए भ्रम
इस बात का,
कि सपनों के पीछे भागना सच नहीं है
बड़ी कसक है दोस्त...
खैर छोड़ो...
तुम्हें याद है
जब तुमने फोन पर कहा था
जान, कैसे आउं
पैसे खत्म हो गए हैं
फिर तुमने कहा
आने का मन भी है
क्या करूं?
और तुम आ गए थे न
पैसे उधार मांगे थे दोस्त ?
अब तो अपनी गाड़ी भी है तुम्हारे पास
फिर क्यों नहीं आते
आओ न एक बार
चंद लमहें उधार लेकर...
Wednesday, May 27, 2009
मेरे दोस्त की हौसला अफ़जाई
'' कैसे कह दूं कि थक गया हूं मैंन जाने किस किस का हौसला हूं मैं ''
मेरे दोस्त ने मेरे लिए कहा था, बहुत पहले...उसे और मुझे नहीं पता कि किसकी लाइन है...हो सकता है उसने खुद भी लिखा हो...लेकिन मैं जरूर जानना चाहती हूं कि ये किसकी लाइन है...किसी को पता हो तो कृपया बताएं....
Sunday, May 24, 2009
मैं बैल हांकूंगा
बाबू!
यहां मन नहीं लगता
ओझल हो रहा है सबकुछ
बाबू...
बस! बस!
यहां मन नहीं लगता
चलो, चलो...
ये जगमग चांद सितारे नहीं बाबू
मुझे मद्दिम सी डिबिया में रहना है
यहां नहीं बाबू
यहां मन नहीं लगता
चिकनी जुबान, चिकने लोग, चिकना फर्श
मेरा पैर फिसलता है बाबू!
यहां नहीं दोस्त मेरे
मुझे बुद्धू बिल्लू के पास जाना है
नहीं, नहीं बाबू
यहां ना छोडे जाओ
इस शहर में मेरा दम घुटता है
हर कोई तमीज से बोलता है यहां
बाबू यहां मेरा घर नहीं
मुझे घर जाना है
मुझसे न होगी चाकरी
बैल जैसा न होना बाबू
मैं खेतों में बैल हांकूंगा
बस बाबू बस!
मुझे घर जाना है
यहां मेरा घर नहीं
यहां मन नहीं लगता
ओझल हो रहा है सबकुछ
बाबू...
बस! बस!
यहां मन नहीं लगता
चलो, चलो...
ये जगमग चांद सितारे नहीं बाबू
मुझे मद्दिम सी डिबिया में रहना है
यहां नहीं बाबू
यहां मन नहीं लगता
चिकनी जुबान, चिकने लोग, चिकना फर्श
मेरा पैर फिसलता है बाबू!
यहां नहीं दोस्त मेरे
मुझे बुद्धू बिल्लू के पास जाना है
नहीं, नहीं बाबू
यहां ना छोडे जाओ
इस शहर में मेरा दम घुटता है
हर कोई तमीज से बोलता है यहां
बाबू यहां मेरा घर नहीं
मुझे घर जाना है
मुझसे न होगी चाकरी
बैल जैसा न होना बाबू
मैं खेतों में बैल हांकूंगा
बस बाबू बस!
मुझे घर जाना है
यहां मेरा घर नहीं
Saturday, May 23, 2009
ग्लैमर
कितना डराता है तुम्हे
तुम्हारा चेहरा???
जब तुम उतार देती हो
रंग-रोगन
चेहरे पर बन आए उस निशान को देखकर
क्या किलस उठती हो तुम...
जिसे झुर्रियां कहते हैं???
शायद दुख से भर जाती हो तुम
इसलिए आंख के तुरंत नीचे
उग आया है काला धब्बा
और कई बार कपाल पर दिखती हैं सिलवटें
दुबली होने का और कितना प्रयत्न करोगी तुम
खुद को बिना साज-सज्जा के
पहचान पाती हो तुम???
बड़ बड़ बड़ बड़ तुम्हारे होंठ
उफ्फ
सुंदर जुल्फों का राज
लोगों को बताओगी कभी???
कितना भ्रम फैलाया है तुमने,
कितनी-कितनी युवती-किशोरी रोज ही देखती है सपने
तुम्हारे जैसा होने का...
तुम कभी आओगी उस मंच पर
जहां से बयां होगा सिर्फ सच
उसे सुनेंगे तुम्हारे बच्चे भी
जो तबतक बड़े हो गए होंगे
लेकिन याद होगा उसे उसका पूरा बचपन
कह पाओगी कभी अपनी व्यथा
या फिर उसे भी ढाप दोगी किसी गाढ़े रंग से
जैसे ढाप देती हो आंखों के नीचे पड़े गढ्ढे को..
या फिर उगल दोगी सच
खत्म करोगी द्वंद
स्त्री, जागो
वस्तु मत बने रहो
वो तो तुम पहले भी थी
फिर आज क्या बदला तुमने
तुम्हारा चेहरा???
जब तुम उतार देती हो
रंग-रोगन
चेहरे पर बन आए उस निशान को देखकर
क्या किलस उठती हो तुम...
जिसे झुर्रियां कहते हैं???
शायद दुख से भर जाती हो तुम
इसलिए आंख के तुरंत नीचे
उग आया है काला धब्बा
और कई बार कपाल पर दिखती हैं सिलवटें
दुबली होने का और कितना प्रयत्न करोगी तुम
खुद को बिना साज-सज्जा के
पहचान पाती हो तुम???
बड़ बड़ बड़ बड़ तुम्हारे होंठ
उफ्फ
सुंदर जुल्फों का राज
लोगों को बताओगी कभी???
कितना भ्रम फैलाया है तुमने,
कितनी-कितनी युवती-किशोरी रोज ही देखती है सपने
तुम्हारे जैसा होने का...
तुम कभी आओगी उस मंच पर
जहां से बयां होगा सिर्फ सच
उसे सुनेंगे तुम्हारे बच्चे भी
जो तबतक बड़े हो गए होंगे
लेकिन याद होगा उसे उसका पूरा बचपन
कह पाओगी कभी अपनी व्यथा
या फिर उसे भी ढाप दोगी किसी गाढ़े रंग से
जैसे ढाप देती हो आंखों के नीचे पड़े गढ्ढे को..
या फिर उगल दोगी सच
खत्म करोगी द्वंद
स्त्री, जागो
वस्तु मत बने रहो
वो तो तुम पहले भी थी
फिर आज क्या बदला तुमने
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