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Wednesday, November 2, 2011

चीरहरण

बरसने को है चंद बूंदे
बस थोड़ी देर और।
थोड़ी देर रुक जाओ
भीग जाने दो मेरा दामन
कर लेने दो भोग
द्रौपदी बन जाने दो एक बार
सिर्फ एक बार रंग लेने दो मुझे मेरी लपटें
संवार लेने दो इसे।
खून के जिस घूंट को पीकर
प्यासी रह गई आत्मा
बुझा लेने दो उस प्यास को।
घटा को बरसने दो
उनके पाप धुलेंगे।
और मुझे चैन आएगा
कलयुग के उस दुशासन को पता लगने दो
हो जाने दो एहसास
सिर्फ एकबार
मुझे पता है, यहां कोई कृष्ण नहीं है।
और ना ही चीरहरण हो रहा है
ना ही वस्त्र उतारे जा रहे हैं
लेकिन आंखें क्या कम नंगा करती है
क्या कम तड़प होती है उसके भीतर
जिसे तरेर-तरेर कर छलनी किया जाता है
भेदा जाता है।
इस पाप को धुल जाने दो
तब मैं चलूंगी
डग-डग लंबी चाल
विजेता बनने का सुख
मुझे भी हासिल करने दो
इस अनाम को ठहरने दो
जिसका नाम स्त्री है, देह नहीं
पीने दो मुझे दो चार और कड़वे घूंट
फिर चलेंगे...
उस लपलपाहट की जड़ को समझ लेने दो
वासना के मूल को समझ लेने दो
जान लेने दो ये सच भी
जो धूप छांव की तरह लगातार पीछा करती है
बोझिल से इस मन को डूब जाने दो उस गहराई में
जहां से सच निकलेगा
उस आत्मा को निचोड़ लेने दो
जिसने कई आत्माओं को रौंदा
भटक लेने दो आज उसी गली
जहां से होकर कभी परमात्मा नहीं गुजरते
उस कसीली आंखों का सच देख लेने दो
जो बेटी पैदा करती है
जरा भांप लेने दो उसका भय
बुझने दो उस पहेली को
जिसमें वो रचता है अपना पराया संसार
उस बारीक फर्क को भेद लेने दो
मैं चुपचाप चल दूंगी तुम्हारे साथ
देख लेने दो बलात्कारी का अपनी बेटी से लाड़
चीरहरण का सच जा लेने दो।।।

1 comment:

ana said...

bahut badhiya post