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Thursday, May 15, 2008

"राज ठाकरे जी" ये वक्त राष्ट्र को जोड़ने का है उसे तोड़ने का नहीं....

राज ठाकरे को मी मराठी का कीड़ा इस तरह काट गया है कि वो बाकी सब भूल गए हैं...वो ये तक भूल गए हैं कि हजारों लाखों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक नेता की मर्यादा क्या होनी चाहिए....जिस तरह से राज ठाकरे बिहार यूपी को टारगेट कर रहे हैं या तो इस बात से बिहार और यूपी सरकार को सीखना चाहिए....या फिर केंद् को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए...केंद्र को ये तय करना चाहिए कि एक प्रदेश का आदमी दूसरे प्रदेश में नहीं फटकेगा....ये तय करने का अधिकार राज ठाकरे या किसी भी दूसरे नेता को कतई नहीं होना चाहिए.....जाने किस सेंस में राज ठाकरे ने ये कह दिया कि यूपी बिहार के लोग कौवा हैं.....और लालू चालू है.....अच्छी और सुसंस्कृतिक पृष्ठभूमि के होने के बाद भी राज अगर इस तरह की आग उगल रहे हैं, तो उन लोगों के बारे में क्या कहेंगे जो निरा मुर्ख हैं.....जहां काम देखते हैं वहां चले आते हैं....दबा कर काम करते है, सोते हैं और फिर वहीं के हो कर रह जाते हैं....राज को शायद नहीं पता है कि बिहारियों को ये बताते हुए कितनी खुशी होती है कि वो मुंबई या दिल्ली में रह रहे हैं....और न ही उन्हें इस बात की जानकारी लगती है कि काम करने वाले के लिए कहीं भी काम है....और इससे भी ज्यादा शर्मिंदगी की बात तो बिहार और यूपी के शासकों के लिए है जो बार बार इस तरह की फजीहत सुनने के आदी हो गए हैं.....इन्हीं वजहों से कई बार शासक और शोषित का अहसास होता है....
और अव्वल तो ये कि फ़िलहाल जो देश की हालत है...एक पूरा प्रदेश मौत के मंजर से गुजर रहा है और पड़ोसियों को इस कराह का अहसास तक नहीं है.....उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि आतंकवाद से कैसे निबटा जाए....

हमें देखना है और हम देखेंगे वाले नेता जाने और क्या क्या देखना चाहते हैं....इस देश में हर चार महीने में बाद एक शहर बर्बाद हुआ जा रहा है....और इनको इस बात कि चिंता खाए जा रही है कि किसके हिस्से की रोटी किसने खाई....अरे ज़नाब हर आदमी अपने हिस्से की ही रोटी खाता है...जरा देखिये तो बिहार यूपी के लोगों के दिल्ली में आने से कितने तो -नए नए बिजनेस दिल्ली मुंबई वालों को बैटे बिठाले मिल गए हैं.....जिन घरों में बिजली नहीं...ताज़ा हवा नहीं उन घरों के किराये मास्सा अल्लाह.....कभी किसी बिहार यूपी वालों ने अपने प्रदेश के सरकार से इस बात की शिकायत नहीं की होगी...हम जितना कमाते हैं वो वहीं रह जाता है....
दिल्ली एक प्रदेश होने की वजह से इतना संपन्न नहीं है....यह सभी प्रदेशों का केंद्र है....ये राजनेता जिस बात पर चिल्ला रहे हैं उन्हें नहीं पता कि इसके लिए जिम्मेदार भी वही हैं क्यों नहीं दिल्ली मुंबई के अलावा दूसरे राज्यों में उद्योग लगाए जाते हैं......इस बात पर जोर बनाए राज टाकरे...संसद तक पहुंचाए अपनी बातों को कि बिहारियों के लिए उद्योग की व्यवस्था हो....

6 comments:

Suresh Chandra Gupta said...

राज ठाकरे नेता नहीं हैं. नेता ऐसे नहीं होते. नेता जोड़ते हैं, जैसे नेताजी सुभाष ने जोड़ा था. यह तो सिर्फ़ तोड़ना जानते हैं, और यह काम वह बखूबी कर रहे हैं. उनसे समझदारी की उम्मीद करना बेमानी होगा.

संजय बेंगाणी said...

राज नेताओं से अलग नहीं है जो धर्म के नाम पर, जाती के नाम पर वोटबैंक की राजनीति करते है.

ऐसे लोगो को प्रचार न मिले यही इनकी सजा है, सुधारने का तरीका है.

दिनेशराय द्विवेदी said...

वोट के जरिये कुछ हासिल करने की भूख यही हाल कर देती है।

archanabetu said...

आप सबने एक तरह से इस बात का समर्थन किया है कि राज ठाकरे जो कर रहे हैं वो कहीं से उचित नहीं है....लेकिन राज ठाकरे को ये समझ में नहीं आता है...और अगर जानते बूझते ये कर रहे हैं तो इससे ख़तरनाक और शर्मनाक क्या हो सकता ?

Udan Tashtari said...

इनकी हरकतें दुखद और शर्मनाक हैं.

tz said...

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