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Tuesday, April 29, 2008

जाति की आग में झुलस गई बच्ची....


हमारे एक मित्र को इस बात की बड़ी चिंता रहती है कि सुबह सुबह जो बुलेटिन आता है....उसमें खून ख़राबें की खबरें नहीं होनी चाहिए....वो जब भी मिलते हैं हमें ये सलाह जरूर देते हैं...यार क्राइम व्राइम मत दिखाया करो तुम टीवी वालों को पता नहीं क्या नशा चढ़ा रहता है..अरे यार सुबह सुबह तो कुछ अच्छी ख़बरें दिखाया करो.....लीजिए उनके गले में घंटी कौन बांधे..कौन बताए कि हम टीवी वाले तो ख़बर नहीं चलाएंगे लेकिन अख़बार, जो सुबह सुबह आता है...उसमें क्राइम की ख़बरें क्या सेंसर कर के पढ़ोगे...सुबह सुबह के बुलेटिन को हल्का रखने की कोशिश तो हर न्यूज चैनल में की जाती है.... कम से सुबह कि बुलेटिन के फस्ट सेगमेंट में तो इस बात का तकरीबन हर जगह खयालरखा जाता है कि हिंसा न परोसी जाए... कौन चाहता है कि सुबह सुबह लोगों के मन को ख़राब किया जाए....लेकिन अपने देश का क्या करोगे भईया....लोगों को कैसे रोकोगे.....जहां हर दूसरे मिनट एक से बढ़कर एक क्राइम होता है....आज भी मुझे लगता है जब सुबह की पहली बुलेटिन बन कर तैयार हो गई होगी..या होने वाली होगी...तो ख़बर आई मथुरा से....एक छह साल की दलित लड़की को आग में फेंक दिया...बच्ची की हालत इस कदर खराब थी कि पूछिये मत.....अब बताइये क्या करेंगे आप...लोगों को नहीं बताएंगे कि उनके देश में क्या हो रहा है....क्या बताएंगे उथप्पा ने कैसे मुंबई इंडियंस को जीत दिलाई.....या फिर ये बताएंगे कि साइमंड्स वतन लौट गए हैं....लोगों को मुगालते में रखा जाए कि देखो देखो हमारे देश में कितनी शांति है.....अरे भाई बोओगे कांटा तो आम थोड़े ही खाओगे.....जो देश क्राइम करता है उसे देखने के लिए भी तो वही दिया जाएगा न....अब भला उस मासूम सी बच्ची का ऐसा क्या कसूर हो सकता है कि उसे आग में झौंक दिया जाए.....तो भई कसूर भी जान लीजिए बच्ची अपनी माता जी के साथ किसी सवर्णों वाले इलाके से गुजर रही थी.... अब इस नन्ही सी उम्र में उसे क्या पता कि जाति की आग क्या होती है....लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है....फर्क पड़ता है साहेब अब अगर कहीं दलित भड़क गए (जो बहुत संभव है ) तो वो सवर्णों को बस्तियां फूंक डालेंगे....या फिर उनके भी किसी मासूम बच्चे को मार डालेंगे काट डालेंगे....मेरे दोस्त ख़बर दिखाने वाले को तो समझा दिया.......जरा जाओ यार उनके भी ज़ेहन में उतरो जो इस तरह भोर की शुरुआत ही बच्ची को आग में झौंकने से करते हैं.....

2 comments:

सुशील कुमार said...

पता नही कुछ लोग हकीकत से क्यूँ भागने लगते है। क्यूँ नही दुनिया को सुन्दर बनाने की कोशिशो मे थोडा सा अपना योगदान देते बजाए रोने के।

Anonymous said...

shushilje ka kahna bilkul sahi hai.