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Tuesday, May 20, 2008

एक वो दौर था.....एक ये दौर है...कहीं ये दुनिया खत्म होने के करीब तो नहीं !!!

आजकल टीवी पर रिलायंस (कर लो दुनिया मुठ्ठी में ) का एड आता है.... फोन बदले....एसटीडी रेट्स बदले लेकिन लंबी दूरी की बातें आज भी छोटी ही होती है....पता नहीं इस एड में कितना दम है और रिलायंस का फोन कितना सस्ता है...ये भी कहना मुश्किल है...लेकिन इतना तो तय है कि पैसे के मामले में चाहे जितनी अविश्वसनीयता हो लेकिन किसी भी वक्त किसी से बात करने के लिए इस माध्यम की जितनी भी तारीफ की जाए कम है....और ये बात सिर्फ रिलायंस के लिए नहीं बल्कि हर मोबाइल कनेक्शन के लिए सही है.....
आजकल दिल्ली के इस्टएंड फ्लैट में मेरे बड़े भाई साहेब आए हुए हैं.....बात हो रही थी कि आज से पंद्रह साल पहले क्या हालात थे.....भाई साहेब उस वक्त दिल्ली में ही थे......और सिर्फ इसलिए कि हूनुज़ दिल्ली दूर अस्त वो वापस लौट गए अपने घर, अपने शहर.....लेकिन फिर एक बारगी उनके मन में आया कि दिल्ली चला जाए....अब दिल्ली चला जाए, तो ज़रा कंपनी के मालिक से बात भी कर ली जाए....वरना परदेश में बिना नौकरी के क्या लौटना....भाई साहेब और उनके एक मित्र ने अपने मालिक से संपर्क साधने की कोशिश की....विकल्प पर बात होने लगी.....क्या किया जाए...क्या इसके लिए दिल्ली जाकर बात की जाए...लेकिन इस बात का डर भी कि मना कर दे तो? सो दिल्ली आने वाले विकल्प पर विराम...अगला विकल्प फोन था....भाई साहेब के मित्र को भी ये विकल्प ज़ोरदार लगा....लेकिन मिलियन डॉलर क्वाइश्चन ये कि फोन कहां से किया जाए.....मतलब उस वक्त फोन की ये स्थिति थी कि दोनो लोग अगले कई दिनों तक यही विचार करते रहे थे कि क्या किया जाए....दिल्ली फोन कैसे किया जाए....फिर किसी ने बताया कि यहां से पचास किलोमीटर दूर सरकार ने एक पीसीओ लगाया है...वहां चलकर बात करते हैं.....ये काम भागलपुर(बिहार) में भी संभव हो सकता था ये मुझे लगता है लेकिन शायद जानकारी का अभाव रहा हो....या फिर एक अत्यंत आधुनिक तकनीक का भय....दोनो लोगों ने पचास किलोमीटर की दूरी तय करना ही उचित समझा....और वहां पहुंचने के बाद हालात ये कि अब अंदर कैसे जाएं....कितने का बिल पकड़ा दे पता नहीं.....सो दो चार घंटे पीसीओ के बाहर भी गुजारे...
ये सब जब वो दिल्ली में बैठकर अब से थोड़ी देर पहले तक सुना रहे थे....मुझे ये लग रहा था कि या अल्लाह कैसा रहा होगा वो ज़माना भी......
बहरहाल, दोनो लोगों के बीच ये तय हुआ कि पहले इसकी डिटेल ली जाए....ताकि मोटे तौर पर आनेवाले बिल का एक अनुमान लग जाए.....पीसीओ वाले ने बताया, जी रविवार रात अगर बात करें तो पैसे कम लगेंगे....लेकिन उसने ये बताना जरूरी नहीं समझा कि भई अभी बात करते हो तो कितना पैसा देना होगा....तकनीक की जानकारी रखने वालों के साथ ये समस्या आज भी शाश्वत है.....आपने देखा होगा कि ज़रा भी कोई तकनीकि मामले में आप से ज्यादा जानकारी रखता हो वो आपको ऐसे बताएगा मानो कि आप उसे कभी सीख ही नहीं पाएंगे.....लेकिन दूसरी तरफ ये भी सच्चाई है कि जब आप किसी तकनीकी सामान को खरीदना चाहते हैं तो वो आपको बहुत ही जरूरी औऱ आसान बताएगा...जैसे मैने अपनी एक कलीग से पूछा यार ये बताओ लेंस लगाना चाह रही हूं क्या करूं....उसका जवाब सुनिये..अरे रे रे उसको लगाने पर तो बहुत ध्यान रखना होगा..धूल का इसका उसका...फिर हाथ तो एकदम साफ होना चाहिए...देखो अगर ये सब नहीं कर पाओगे तो मत लो हां....सबके बस का नहीं है....मुझे लगा कि सही कह रही है....मुझसे कहां इतना सब होगा.....लेकिन जब लेंस लेना ही था और उसे खरीदने के लिए ऑप्टिकल्स गई उनसे पूछा...तो उनका जवाब सुनिये....वैरी कंफर्ट....ब्यूटी बढ़ा देगा...चश्मे से अच्छा है....इसको लगाना भी आसान है...उतारना भी आसान...भारी भारी सा भी नहीं लगेगा....
उसी तरह से उस पीसीओ वाले ने भी ये नहीं बताया कि अभी बात करेंगे तो कितना पैसा लगेगा....उसने सिर्फ उसी सवाल का जवाब दिया कि रविवार रात बात की जाए तो कितना पैसा लगेगा.....भाईसाहेब बात कर निकले...बिल कुछ तीस रुपये आये.....और जैसे गंगा नहा लिया हो.....तीस रुपये में दिल्ली बात हो गई......
बातों बातों में वो उस दिन को वर्तमान से जोड़ने लगे....कितना आसान हो गया है सबकुछ....यहां दिल्ली के इस्टएंड के एक फ्लैट में बैठकर वहां भागलपुर के एक मोहल्ले में कभी भी किसी से भी बात यूं हो जा रही है....कंप्यूटर पर एक बटन दबाने से पूरी दुनिया खुल जा रही है.....कितना परिवर्तन.....कितना छोटा हो गया है संसार...संसार शायद सिकुड़ रहा है...वैसे ही जैसे मृत्यू के पहले शरीर सिकुड़ने लगता है...भाई साहेब भावुक हो गए...उन्हें ये सब अखड़ रहा है....उनको लग रहा है कि अब इमोशन नहीं रह गया है...ये तो तब ही अच्छा था जब महीनों इंतज़ार करने के बाद एक चिठ्ठी आती थी.....उसमें लिखा होता था....ताउजी बीमार हैं..बाकी सब ठीक है.....मुनिया स्कूल जाते हुए गिर गई थी....हाथ की हड्डी टूट गई लेकिन अब ठीक है....गाय ने बछड़ा दिया...वो बीमार हो गई थी...बाकी सब ठीक है......और सही में ऐसा ही होता भी था.....जबतक चिठ्ठी मिलती थी तबतक तो सबकुछ वैसे भी ठीक हो जाता होगा.....वैसे भाई साहेब की चिंता बेजा नहीं है कि तकनीक ने इमोशन को खत्म कर दिया है............





7 comments:

PD said...

आपने बहुत सही कहा है.. मैं तो अभी भी अपने करीबी दोस्तों को कभी कभी चिट्ठी लिखता हूं.. उसे पढकर बहुत खुश हो जाते हैं.. हाथों से लिखे पत्र क अलग ही महत्व था है और रहेगा..

बाकी सब ठीक है..

mamta said...

इस ad को देखकर पुराने दिनों की याद ताजा हो आती है। और
अब तो भागल पुर क्या लंदन अमेरिका से भी फ़ोन पर बात हो जाती है।

हाँ चिट्ठी लिखना तो अब बहुत ही कम क्या ना के बराबर हो गया है।
वैसे पहले मौसम का हाल भी चिट्ठी मे जरुर लिखा होता था।

Anonymous said...

aapke bhaye saheb thik kahte hain ke ab riste me samvednayen khatam ho gayee hain.phon par baten karne se man ke bich kee diwaren bhale gir jate hon lekin sarhad kee diwaren to hamesha banee rahege.aur jab tak ye diwaren rahengee, tab tak sabhi dikkaten bhi banee rahengeen.taknikee suvidhayen to aaj bhi kewal mahanagaron me hee simit hain.

PRASHANT said...

to quote thomas L fredman"THE WORLD IS FLAT"

DR.ANURAG ARYA said...

अब जमाना वाकई बदल गया है ,पहले पेजर आया फ़िर जब मोबाइल शुरू हुआ था तब इन्कोमिंग कॉल के भी पैसे लगते थे ..कई बार हम लोग भी आपस मे बात करते है पहले किसी डॉक्टर को इमर्जेंसी मे बुलाने पर कितनी मुश्किलें आती होगी ..देखिये न एक शहर मे अपने घर से कितने लोग आपसे जुड़ गए है.....

Udan Tashtari said...

बदलाव का नाम ही जिन्दगी है. कल देखियेगा फिर कुछ बदलेगा. परिवर्तन शाश्वत है.

tz said...

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