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Wednesday, March 26, 2008

मैं आ गई हूं

मैं आ गई हूं
देखो
ज़रा ज़ोर लगाओ
आंखों की पुतलियां फैलने दो
तुम मुझे देख पाओगे
मैं इस बार लौटी हूं
खाली हाथ नहीं
विश्वास से लबरेज़ हूं
मकसद लेकर लौटी हूं मैं
देखो मेरे भीतर
मेरी आंखों में ग़ौर से झांको एक बार
मेरे आने का कारण जान पाओगे
मेरे दोस्त, मेरे मित्र
इस तरह क्यों कांप रहे हो
सभाएं,गोष्ठियां करने वाले
औरतों की मर्यादा को बचाने
उसे सम्मान दिलाने वाले
तुम्हारी आत्मा क्यों थरथरा रही है
एक स्त्री ही तो आई है
आओ मेरा स्वागत करो
अभिषेक करो
मैं आ गई हूं
गला फाड़ो न एक बार फिर से
स्त्री की आज़ादी का गुणगान करो
देखो
एक आज़ाद स्त्री आ गई है.................

7 comments:

avinash said...

हमारी आंखें फटी हुई हैं... हम आपको देख रहे हैं... स्‍वागत है...

विनीत उत्पल said...

aapka swagat hai. yah kavita shayad kadambanee men padhee hai maine.

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

dekhiye aapke aate hi blog guru ki aankhe ftne lgi...mja ki ve dekh bhi rhe hain ...mane aankhe fad-fad ke dekh rhe hain...kya bat hai ji...archna ji aap bhi kmal hain...

archana rajhans said...

धन्यवाद अविनाश

संजय.पुनीता said...

swagat hai. archna jee. ab tak khan gum thi... chaliye aaney ka elan to khub kiy hai apney.

sanjay mishra
dainik bhaskar

Geet Chaturvedi said...

बढि़या है. स्‍वागत है आपका.

tz said...
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